
देहरादून में मलिन बस्तियों के पुनर्वास की चुनौती बढ़ी, काठबंगला में केवल चुनिंदा परिवारों को ही मिलेगा आश्रय
देहरादून। नगर निगम द्वारा काठबंगला क्षेत्र में तैयार किए जा रहे लगभग सवा सौ ईडब्ल्यूएस फ्लैटों में चयनित परिवारों को स्थानांतरित करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन शहर में मौजूद मलिन बस्तियों की वास्तविक संख्या इस व्यवस्था को बेहद अपर्याप्त साबित करती है। नगर निगम क्षेत्र में कुल 129 मलिन बस्तियां चिह्नित हैं, जिनमें 40 हजार से अधिक भवन मौजूद हैं। ऐसे में काठबंगला की मौजूदा पुनर्वास क्षमता ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित हो रही है, क्योंकि फिलहाल केवल कुछ दर्जन परिवारों को ही यहां शिफ्ट किया जा सकेगा। शेष हजारों परिवारों का भविष्य अब भी अनिश्चित बना हुआ है।
रिस्पना और बिंदाल नदियों के किनारों पर पिछले दो दशकों में तेजी से फैली मलिन बस्तियों पर हाई कोर्ट और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के आदेशों के अनुसार कार्रवाई होनी तय है। वर्ष 2016 के बाद बने सभी निर्माण ध्वस्त किए जाएंगे, जबकि 2016 से पूर्व की बस्तियां भी यदि बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में आती हैं, तो उन्हें भी हटाया जाएगा। हालांकि, इतनी बड़ी संख्या में परिवारों के सुरक्षित पुनर्वास की योजना अब तक धरातल पर नहीं उतर सकी है। संसाधनों की कमी और वर्षों से चली आ रही वोट बैंक की राजनीति भी इस प्रक्रिया में बाधा बनती रही है।
जिलाधिकारी सविन बंसल ने छह माह पूर्व विभागों को निर्देशित किया था कि रिस्पना-बिंदाल नदी तंत्र को अतिक्रमण मुक्त करने और पुनर्वास योजना को अंतिम रूप देने की दिशा में तेजी लाई जाए। नगर निगम और एमडीडीए की ओर से कई छोटे अभियान चलाए गए, लेकिन बड़े पैमाने पर कार्रवाई अब भी अधर में है। पृथक राज्य गठन के बाद पिछले 25 वर्षों में झुग्गियों का विस्तार इतना बढ़ चुका है कि कई क्षेत्रों में नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो गया है। निगम की लगभग 7,800 हेक्टेयर भूमि में से अब केवल 240 हेक्टेयर ही शेष है।
प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत ब्रह्मपुरी, काठबंगला, खाला बस्ती, चक शाहनगर सहित कई क्षेत्रों में सैकड़ों आवास बनाए जाने प्रस्तावित थे। इनमें से कुछ आवास तैयार भी हो चुके हैं, लेकिन अधिकांश का आवंटन अभी तक लंबित है, जिससे पुनर्वास की प्रक्रिया और भी धीमी पड़ गई है।










