चार जिले व दो अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को खुद में समेटे हुए अल्मोड़ा जिला, बेहद दिलचस्प है यहां की राजनीति

अल्मोड़ा। गोविंद बल्लभ पंत, हरगोविंद पंत और मुरली मनोहर जोशी जैसी शख्सियतों का नाता इस संसदीय क्षेत्र से रहा है। अल्मोड़ा चार जिले व दो अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को खुद में समेटे हुए है इसका दायरा लिपुलेख दर्रे तक है। भौगोलिक तौर पर जटिलताएं हैं और राजनीतिक तौर पर देखें तो इसका अपना इतिहास रहा है।

सामाजिक तौर पर यहां विविधता व परंपराएं दिखती हैं और लोक जीवन उनमें रमा दिखता है। पिथौरागढ़ जिले का धारचूला-मुनस्यारी जनजातीय क्षेत्र है।

भौगोलिक परिदृश्य अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़, चंपावत जिलों को मिलाकर एक संसदीय सीट। 275 किमी लंबी नेपाल सीमा पिथौरागढ़ और चंपावत को छूती है। जबकि, 136 किलोमीटर लंबी चीन सीमा भी पिथौरागढ़ जिले से जुड़ती है।

नेपाल सीमा पर सात पैदल पुल के अलावा सीतापुल, धारचूला, बलुवाकोट, जौलजीबी, झूलाघाट, ढोडा व टनकपुर में झूलापुल है। बनबसा में मोटरपुल बना है। चीन सीमा से लगा क्षेत्र उच्च हिमालयी है।

अल्मोड़ा जिले से अलग होकर 24 फरवरी 1960 को पिथौरागढ़ जिला बना। वहीं, 15 सितंबर 1997 को बागेश्वर व चंपावत जनपद अस्तित्व में आए। अल्मोड़ा आबादी के लिहाज से भले ही यह संसदीय क्षेत्र अन्य से छोटा है, लेकिन क्षेत्रफल की दृष्टि से देखें तो 14,260 वर्ग किमी में फैला हुआ है।

सामाजिक ताना-बाना अल्मोड़ा संसदीय सीट पर विविधता है। सभी वर्ग-जातियों के लोग यहां रहते हैं। मुख्य रूप से यहां हिंदू बहुल जनसंख्या है। जातीय समीकरण के अनुसार 45 फीसद राजपूत, 23 फीसद ब्राह्मण व 27 फीसद दलित समुदाय है। इसके अलावा सात फीसद में जनजाति, अल्पसंख्यक व अन्य समुदाय शामिल है।

चार जिलों में 14 विधानसभा सीट अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र में चार जिलों में 14 विधानसभा सीट हैं। नौ सीटों पर भाजपा और पांच पर कांग्रेस काबिज है।

राजनीतिक इतिहास भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत का यह संसदीय क्षेत्र जन्मस्थान रहा। प्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत भी यहीं जन्मे। आजादी के बाद स्वतंत्रता संग्राम सेनानी देवी दत्त, बद्री दत्त पांडे, हरगोविंद पंत ने इस संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा और जीते।

वर्ष 1951 से 1989 तक इस सीट पर कांग्रेस काबिज रही। एक बार वर्ष 1977 में लोक दल के टिकट पर मुरली मनोहर जोशी जीते। इसके बाद वर्ष 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के हरीश रावत ने उन्हें पराजित किया।

वर्ष 1991 के बाद 2004 तक लगातार पांच लोकसभा चुनावों में यहां भाजपा प्रत्याशी विजयी रहे। 2009 में सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने के बाद भाजपा की जीत पर ब्रेक लगा और कांग्रेस के प्रदीप टम्टा जीतने में सफल रहे, लेकिन 2014 में यह सीट फिर भाजपा के पाले में आ गई और वर्तमान तक भाजपा के अजय टम्टा यहां से सांसद है। इस संसदीय क्षेत्र से पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी, काशी सिंह ऐरी ने भी 1989 में चुनाव लड़ा, लेकिन जीतने में सफल नहीं हुए।

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