अल्मोड़ा में पत्रकारिता के गिरते स्तर पर सवाल, सामाजिक कार्यकर्ता संजय पांडे ने जताई चिंता

अल्मोड़ा। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, क्योंकि यही वह माध्यम है जो सत्ता को आईना दिखाने के साथ-साथ समाज की सच्चाई को सामने लाता है। लेकिन हाल के समय में कई स्थानों पर पत्रकारिता का स्तर गिरता हुआ दिखाई दे रहा है, जो लोकतंत्र और समाज दोनों के लिए चिंताजनक संकेत है।

सामाजिक कार्यकर्ता और आरटीआई एक्टिविस्ट संजय पांडे ने कहा कि एक समय था जब पत्रकारिता सत्य, साहस और जनसेवा का प्रतीक मानी जाती थी। उस दौर में पत्रकार सत्ता से सवाल करने से नहीं डरते थे और जनता के अधिकारों के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करते थे। खबरें समाज को जागरूक करने और व्यवस्था में सुधार लाने का माध्यम बनती थीं।

उन्होंने कहा कि आज कुछ जगह पत्रकारिता मिशन से हटकर स्वार्थ और सनसनी का माध्यम बनती जा रही है। टीआरपी और प्रसिद्धि की दौड़ में कई बार सच्चाई पीछे छूट जाती है। बिना सत्यापन के खबरें फैलाना, पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग करना और निजी हितों को प्राथमिकता देना पत्रकारिता की विश्वसनीयता को कमजोर कर रहा है।

संजय पांडे का कहना है कि जब पत्रकारिता सच के बजाय प्रभाव और दबाव के आगे झुकने लगती है, तो समाज का विश्वास भी डगमगाने लगता है। यह स्थिति केवल पत्रकारिता के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र के लिए खतरे का संकेत है।

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि आज भी कई पत्रकार ईमानदारी, साहस और निष्ठा के साथ सच को सामने लाने का काम कर रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि पत्रकारिता फिर से अपने मूल धर्म—सत्य, निष्पक्षता और जनहित—को सर्वोपरि रखे।

उन्होंने कहा कि जब कलम बिकने लगती है तो सच की आवाज़ दबने लगती है और जब सच दब जाता है, तो लोकतंत्र भी कमजोर होने लगता है।

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